इसके अभिव्यक्ति के आचरण को
लालच - ईर्ष्या - स्वार्थ तथा झूठी महत्वकांक्षा ने
भौतिकता तथा सेक्स ने
कलंकित भी किया है
और विद्रूपित भी ,
जबकि सब जानते हैं
इंसान प्यार की संतान है
प्यार - ममत्व इंसान के लहू जैसा है
तभी कहता हूँ
अभी समय है
प्यार खोजो और सहेजो ......अवधेश सिंह [ कवि -लेखक ]
मेरी पुस्तक का नाम है - छूना बस मन
[ मै आपको सिर्फ और सिर्फ मन या हृदय को स्पर्श कर इसे महसूस करने को कहता हूँ ]
पुस्तक का तकनीकी विवरण - ISBN : 978-93-81480-42-7, Year -2013 ]
अंदर के पृष्ठ को देखें -
" छूना बस मन " अनुभूतियों की लहरों में प्रेम की अठखेलियाँ हैं जहाँ भावनाएं ज्वार - भाटें की तरह मन के महा समुद्र में वंचनाओं - अंकुशो से टकराती हुईं हर पल कुछ अतिरेक अतिरंजित करती हैं ।
मन में ठहराव कहाँ है पर कविता उसे पकड़ कर शब्दों में बाँध लेती है कवि ने कहा है
" आँखों में / दिखतें हैं / काँटों के जंगल / गुम गयी / अन्दर बहती / नदी / सूख गया / मन का जल.."
आज हम किसी की इच्छा करते हैं , कल हम किसी के कारण ब्यथित होते है ।
प्रणय जीवन का अभिंग अंग है जब यह शब्दों में ब्यक्त होता है तभी कविता - गीत या ग़ज़ल होती है ।
जीवन की टूटन - बिखराव के मूल में बनना - जुड़ना नैसर्गिक है और आज समय के आपाधापी में आतंरिक इच्छा के रहते हुए भी इस मूल तक कोई दुबारा पहुचने का मार्ग नहीं खोजना चाहता है ।
प्रयास है कविताओं का यह संकलन पाठक के प्रेम अतीत को दोहराने में उसकी मदद कर उसे कुछ सकून देगा ।
प्रेम उम्र के बढ़ने के साथ एक अछूत अनुभूति नहीं है इसका गाढ़ापन इसकी सांद्रता उम्र के साथ बढ़ जाती है सफल पारिवारिक जीवन व आधुनिक छो टे परिवार की यह कसौटी है ।
यह वर्तमान को बिखरने से भी रोकेगा । भविष्य को मजबूत करने का कारण बनेगा ।
यहाँ मांसलता को सीढ़ी बनाकर चढ़ा प्रेम परिपक्वता के आकाश में
उन्मुक्त पंछियों की तरह विचरण करता हुआ दिखेगा ...
छूना बस मन " यहाँ मन का तात्पर्य उस आतंरिक और अंतिम इच्छा से है
जब व्यक्ति मन को सभी भोतिकता से बढ़कर तरजीह देता है ।
मन को छूना , मन का स्पर्श करना जहाँ केवल और केवल मन का ही स्पर्श है ,
यहाँ मन को जानना , मन की बात सुनना, मन की अनुभूति के प्रति आकर्षित होना ,
मन के स्पंदन जानना ही बस एक प्रमुख विषय हो ।
जब ध्वनि तरंग , संवेग - वेग , आवेग आदि मन के धागों में लिपट जाएँ ।
और अंततः मन से मिलने वाले सन्देश , सिग्नल बस मन की परिधि में समां जाएँ ,
वहीँ से प्रारंभ होता है कविता के इस संकलन का नाम " छूना बस मन ".
जहाँ तार्किक , बौद्धिक , ब्यव्हारिक, व्यापारिक गड़ना संगड़ना , हिसाब -किताब से जुडी कोई सक्रियता न हो । मन की आँखों से देखो , मन से मानों, मन की जानो, मन की वंचनाओं , परहेज , संकल्पों मन की अतिरेक आशाओं -निराशाओं से ओत प्रोत डूब जाने की ही बस एकमात्र प्रवत्ति हो ।
मन बेमन न हो , मन की मनमानी बेमानी न हो , मन की नैसर्गिकता पर प्रश्न न हों . देखे :
" मन कंजूस की / पोटली में बंधा / मटमैला मन दर्पण / खोले इसे / कर दो इसके सामने / अपना सब कुछ / प्रेम को अर्पण..." या " प्रेम ऋतु / बसंत में /अक्सर परखते हैं / वेलेनटाइन प्रेम /घर की बालकनी / आफिस के कोने पर / हरी घास के / नर्म बिछौने पर / चुपके से चखते हैं "
यह कविताओं का प्रेम -संकलन संभवत भौतिकता में डूबे समाज में मन से भाग रहे लोगों को अपने अन्दर कुछ भूला बिसरा , खोया अतीत को पुनः खागालने का अवसर देता है ।
भागम भाग व सभी प्रकार की अति के साथ बटोरने की प्रवृति ने मानव में इतना भय समां दिया है की सभी पारस्परिक संबंधों में प्रतिशत दशमलव का हिसाब किताब, गड़ना संगड़ना के बीच उलझ गएँ है ।
यह सच है की खुशियों की गिनती बढ़ी है लेकिन
उनसे प्राप्त अवसादों की संख्या भी उतनी ही बढ़ी है ,
ठहराव कहाँ हैं ।
मिलने वाली जीत और हार के मिलने से कहीं ज्यादा बहुत कुछ छूटा टूटा बिखरा है ।
जब कहीं किसी का अपना संसार खो रहा हो , कोई स्वर्ण से जडित हो कर भी खुद को भिखारी माने ,
बलशाली निर्बल हो , राजा राज पट त्याग का विचार करे ।
एक छोटी बात पर कोई जीवन त्याग दे , एक तिनका सा सहारा यदि जिंदगी की सौगात दिलाये शायद तभी निकलेगी एक ईमानदारी की वह आवाज जो कही जाएगी "दिल की बात दिल से "
और होगा मनचाहा परिवर्तन ।
तभी उसर बन चुका यह उबड़ खाबड़ समाज में उग सकेंगे प्रेम हरे भरे वन उपवन .
पुस्तक कवर का चित्र :
"छूना बस मन" एक प्रेम अनुरोध है ,
प्रेम से परिपूर्ण गाथा है ,
प्रकति की वान्ग्यमयता में डूबी प्रेम कहानी है
इसमें निहित दर्शन प्रत्येक बार हमें
सहजता, स्नेह, जीवन के स्पंदन का संजीदा अनुभव देगा ।
पुस्तक पढ़ें और इसे अपने शयन कक्ष में करीने से रखें ....
लेखक की गारंटी है । प्रेम फिर उगेगा जिसकी जमीन तो है पुस्तक बीज का काम करेगी ।
संपर्क - ईमेल - awadheshdm@gmail.com
व्हाट्सेप-9868228699



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